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कल्पना करिए की जेफ्री एप्सटीन ईरान का मुस्लिम होता और इसमें डोनाल्ड ट्रंप, बिल गेट्स, प्रिंस एंड्रयू, जेफ बेज़ोस की जगह सद्दाम हुसैन, मोअम्मर गद्दाफी, एमबीएस का नाम होता।
ये सारी घिनौनी हरकतें करते हुए इन लोगों के वीडियो और फोटो होते तो क्या होता।
भारतीय मीडिया समेत पूरी दुनिया का मीडिया नंगा हो कर नाच रहा होता, हर टीवी स्टूडियो मे दाढ़ी वाले बैठे होते जिनसे जवाब मांगा जा रहा होता।
दुनिया के दो अरब मुसलमानों को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया गया होता, इस्लाम और कुरआन पर चर्चाएं हो रही होतीं।
मुसलमानों का जीना दूभर हो गया होता। चलते फिरते सोते जागते एप्सटीन का भूत मुसलमानों के साथ लगा होता मगर चूंकि मुसलामानों क नाम नहीं है तो दुनिया में खामोशी है।
बाल अधिकार, मानवाधिकार महिला अधिकार जैसी संस्थाओं की अकाल मृत्यु हो गई है।
वो उर्दू नामधारी जो ईरान में मानवाधिकार के लिए मरे जा रहे थे, जो अमेरिका इजरायल युरोप को अपना रुहानी बाप समझते हैं मर गये हैं।
अल्लाह ने जालिमों को जालिमों के जरिए ही सरेआम जलील करवा दिया।
इसी में हमारा यकीन भी है
वो तु इज्जू मनतशा
व तु जिल्लू मनतशा

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