कैप्टन शाम्भवी पाठक


 कैप्टन शाम्भवी पाठक को पता था कि कुछ गड़बड़ है। इंस्ट्रूमेंट्स ऊपर-नीचे हो रहे थे। एयरक्राफ्ट अपनी स्टेबिलिटी खो रहा था। उन डरावने पलों में, जब ज़्यादातर लोगों के दिल डर से तेज़ी से धड़कने लगते, उनका दिल शांत रहा।


उनके हाथ कंट्रोल्स पर मज़बूती से टिके रहे।

उनका दिमाग खराब होती मशीन से भी ज़्यादा तेज़ी से काम कर रहा था।

उनका एकमात्र विचार अपने बारे में नहीं था — बल्कि उन यात्रियों के बारे में था जो उन पर निर्भर थे।




उन्होंने कॉकपिट नहीं छोड़ा।

उन्होंने कंट्रोल नहीं खोया।

वह अपनी सीट पर बैठी रहीं, एयरक्राफ्ट को बचाने, नुकसान कम करने, जान बचाने के लिए आखिरी सेकंड तक लड़ती रहीं।


क्योंकि एक पायलट यही करता है।उन्हें घबराने का ऑप्शन नहीं मिलता।


वह एक प्रोफेशनल के तौर पर शहीद हुईं, जिसने अपनी आखिरी सांस तक अपनी ड्यूटी निभाई।

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